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Showing posts from April, 2008

Sid's Poem...

Sid is my "bestest" friend. He is currently pursuing Ph. D. degree in U. S. A. He wrote this piece when we had a slight falling out and this poem makes me cry every time I recite this. I am sorry Sid, for those times! एकांत गान अथवा तू बहुत कमज़ोर , साथी अथवा मैं बड़ा मजबूर , साथी था तू सपना, था तू अपना, मिलकर कितने हम दूर चले। किस सहज भांति हम-तुम-हम को थे अन अवरोधित पूर चले। हम हाथ मिला कर साथ चले, गणना विहीन दिन रात चले। जग छूट चला, जग रूठ चला, दे नियति को हम मात चले। ये बात कहाँ थी ज्ञात मुझे? - साथी, आगे जो होना है। खोना है, खोना है, केवल घुट घुट कर रोना है। सीमाओं को था भूल चुका आमूल चूल परिवर्तित-सा, कुछ मैं बदला, कुछ तू बदला, हो चला प्रेम वितर्कित - सा। क्या यह मानूं तू रूठ चला? वह प्रेम हमारा टूट चला? क्या भंग हुआ मेरा सपना, अब रहा न तू मेरा अपना? मैं पूछ पूछ कर अस्त हुआ, इस बार भी शायद पस्त हुआ। मैं सिर नीचे ही टेक चला, नाकामी में ही मस्त हुआ। जो बीत गई सो बात गई? मानूं यह कि, अब न मानूं? जानूं मैं नाहक इतना ही, अब भी तुझको अपना मानूं। मेरी निधि, मेरा संबल,...

Ghar ki yaad...

A beautiful poem about "Home, Sweet Home" by Bhavani Prasad Mishra, an exponent of Hindi poetries. The feelings portrayed here resonate with the feeling I have for my home...I pray for my family's happiness and recite this poem. आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है, रात भर गिरता रहा है, प्राण मन घिरता रहा है, अब सबेरा हो गया है, कब सबेरा हो गया है, ठीक से मैंने न जाना, बहुत सो कर सिर्फ़ माना - क्योंकि बादल की अँधेरी, है अभी तक भी घनेरी, अभी तक चुपचाप है सब, रात वाली छाप है सब, गिर रहा पानी झारा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर, बह रही है हवा सरसर, काँपते हैं प्राण थर-थर, बहुत पानी गिर रहा है, घर नज़र में तिर रहा है, घर कि मुझसे दूर है जो, घर खुशी का पूर है जो, घर कि घर में चार भाई, मायके में बहिन आई, बहिन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर! आज का दिन-दिन नहीं है, क्योंकि इसका छिन नहीं है, एक छिन सौ बरस है रे, हाय कैसा तरस है रे, घर कि घर में सब जुड़े हैं, सब कि इतने कब जुड़े हैं, चार भाई चार बहिनें, भुजा भाई प्यार बहिनें, और माँ बिन-पढी मेरी, दुःख में वह गढ़ी मेरी, माँ कि जिस...