Sid's Poem...

Sid is my "bestest" friend. He is currently pursuing Ph. D. degree in U. S. A. He wrote this piece when we had a slight falling out and this poem makes me cry every time I recite this. I am sorry Sid, for those times!

एकांत गान अथवा तू बहुत कमज़ोर, साथी अथवा मैं बड़ा मजबूर, साथी

था तू सपना, था तू अपना,
मिलकर कितने हम दूर चले।
किस सहज भांति हम-तुम-हम को
थे अन अवरोधित पूर चले।

हम हाथ मिला कर साथ चले,
गणना विहीन दिन रात चले।
जग छूट चला, जग रूठ चला,
दे नियति को हम मात चले।

ये बात कहाँ थी ज्ञात मुझे?
- साथी, आगे जो होना है।
खोना है, खोना है,
केवल घुट घुट कर रोना है।

सीमाओं को था भूल चुका
आमूल चूल परिवर्तित-सा,
कुछ मैं बदला, कुछ तू बदला,
हो चला प्रेम वितर्कित -सा।


क्या यह मानूं तू रूठ चला?
वह प्रेम हमारा टूट चला?
क्या भंग हुआ मेरा सपना,
अब रहा न तू मेरा अपना?

मैं पूछ पूछ कर अस्त हुआ,
इस बार भी शायद पस्त हुआ।
मैं सिर नीचे ही टेक चला,
नाकामी में ही मस्त हुआ।

जो बीत गई सो बात गई?
मानूं यह कि, अब न मानूं?
जानूं मैं नाहक इतना ही,
अब भी तुझको अपना मानूं।

मेरी निधि, मेरा संबल,
तू था मेरा परिचय प्रतिपल,
है याद तुझे तेरा कहना,
"संसार है रचना बस अपना"?

अफ़सोस नहीं सपना टूटा,
केवल इतना कि तू रूठा।
रूठा इतना, मुख मोड़ चला,
मंझधार में मुझको छोड़ चला।

तू ही बता, क्या बाकी आस रखूँ?
किन लोगों पर विश्वास रखूँ?
फ़िर फ़िर के ठोकर खाना है,
होकर खुश, पूर्वाभास रखूँ?

जब भी बूँदें गिरती हैं
कुछ छज्जे पर और कुछ भीतर
मुझे तेरी याद सताती है
गिन गिन कर याद दिलाती हैं
जब हम तुम ताल मिलाते थे
रस्ते पर चाल मिलाते थे
और बूँदें तब भी गिरती थीं
थोड़ी तुझपर, थोड़ी मुझपर
वो बूँदें दिल को रमती थीं
मेरी तेरी क्या जमती थी
जब हम तुम भिंगा करते थे
एक दूजे पर जीते मरते थे

इन बूंदों में वो बात कहाँ,
है इनकी वो औकात कहाँ?
जो दें ये मुझको कुछ जीवन
वो प्यार, वो ताकत औ' अपनापन।

ये बूँदें शोर मचाती हैं,
आडम्बर खूब रचाती हैं।
चिल्ला चिल्ला कहतीं सुनने,
यह सबको हैं सपने बुनने।

मैं मूरख था इनकी सुनाता था,
हाँ, मैं भी सपने बुनता था।

आडम्ब ये इनका बंद हुआ, पूरा अब जाकर छंद हुआ।

- सिद्धार्थ सांत्रा

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