A beautiful poem about "Home, Sweet Home" by Bhavani Prasad Mishra, an exponent of Hindi poetries. The feelings portrayed here resonate with the feeling I have for my home...I pray for my family's happiness and recite this poem. आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है, रात भर गिरता रहा है, प्राण मन घिरता रहा है, अब सबेरा हो गया है, कब सबेरा हो गया है, ठीक से मैंने न जाना, बहुत सो कर सिर्फ़ माना - क्योंकि बादल की अँधेरी, है अभी तक भी घनेरी, अभी तक चुपचाप है सब, रात वाली छाप है सब, गिर रहा पानी झारा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर, बह रही है हवा सरसर, काँपते हैं प्राण थर-थर, बहुत पानी गिर रहा है, घर नज़र में तिर रहा है, घर कि मुझसे दूर है जो, घर खुशी का पूर है जो, घर कि घर में चार भाई, मायके में बहिन आई, बहिन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर! आज का दिन-दिन नहीं है, क्योंकि इसका छिन नहीं है, एक छिन सौ बरस है रे, हाय कैसा तरस है रे, घर कि घर में सब जुड़े हैं, सब कि इतने कब जुड़े हैं, चार भाई चार बहिनें, भुजा भाई प्यार बहिनें, और माँ बिन-पढी मेरी, दुःख में वह गढ़ी मेरी, माँ कि जिस...